श्री शिव चालीसा: संपूर्ण पाठ और हिंदी भावार्थ

शिव चालीसा का पूर्ण पाठ, प्रारंभिक व समापन दोहे, ४१ प्रचलित चौपाइयाँ और सरल हिंदी भावार्थ पढ़ें। शिव चालीसा वीडियो सहित।

शिव चालीसा का परिचय

शिव चालीसा भगवान शिव की भक्ति में रचित लोकप्रिय स्तुति है। इसमें शिव के स्वरूप, समुद्रमंथन, भगीरथ, श्रीराम की पूजा और भक्त की प्रार्थना का वर्णन है। इस पाठ में प्रारंभिक दोहा, ४० मुख्य चौपाइयाँ, अयोध्यादास की समापन चौपाई और प्रचलित समापन दोहे दिए गए हैं।

अलग-अलग पुस्तकों में चौपाई-गणना और शब्दों के छोटे पाठांतर मिलते हैं। पूरा पाठ पढ़ें या शिव तांडव स्तोत्र देखें।

मंगलाचरण — दोहा

जय गणेश गिरिजा सुवन, मंगल मूल सुजान।
कहत अयोध्यादास तुम, देहु अभय वरदान॥

भावार्थ: अयोध्यादास पार्वतीपुत्र गणेश की वंदना कर निर्भयता का वर मांगते हैं।

शिव चालीसा — चौपाइयाँ

जय गिरिजा पति दीन दयाला।
सदा करत सन्तन प्रतिपाला॥ ॥ १ ॥

भावार्थ: हे करुणामय शिव, आप संतों और दीनजनों की रक्षा करते हैं।

भाल चन्द्रमा सोहत नीके।
कानन कुण्डल नागफनी के॥ ॥ २ ॥

भावार्थ: शिव के मस्तक का चंद्रमा और उनके नागाभूषणों का वर्णन है।

अंग गौर शिर गंग बहाये।
मुण्डमाल तन छार लगाये॥ ॥ ३ ॥

भावार्थ: उनके गौर अंग, जटाओं से बहती गंगा और भस्मधारण का स्मरण है।

वस्त्र खाल बाघम्बर सोहे।
छवि को देखि नाग मन मोहे॥ ॥ ४ ॥

भावार्थ: व्याघ्रचर्मधारी शिव का अलौकिक रूप भक्तों को आकर्षित करता है।

मैना मातु की ह्वै दुलारी।
बाम अंग सोहत छवि न्यारी॥ ॥ ५ ॥

भावार्थ: माता पार्वती शिव के वामभाग में शोभायमान हैं।

कर त्रिशूल सोहत छवि भारी।
करत सदा शत्रुन क्षयकारी॥ ॥ ६ ॥

भावार्थ: त्रिशूलधारी शिव अन्याय का नाश करने वाली शक्ति हैं।

नन्दि गणेश सोहै तहँ कैसे।
सागर मध्य कमल हैं जैसे॥ ॥ ७ ॥

भावार्थ: नंदी और गणेश से सुशोभित शिवपरिवार का चित्रण है।

कार्तिक श्याम और गणराऊ।
या छवि को कहि जात न काऊ॥ ॥ ८ ॥

भावार्थ: कार्तिकेय, गणेश और शिवपरिवार की अनुपम छवि की स्तुति है।

देवन जबहीं जाय पुकारा।
तब ही दुख प्रभु आप निवारा॥ ॥ ९ ॥

भावार्थ: देवताओं की पुकार पर शिव संकट का समाधान करते हैं।

किया उपद्रव तारक भारी।
देवन सब मिलि तुमहिं जुहारी॥ ॥ १० ॥

भावार्थ: तारकासुर से पीड़ित देवता शिव की शरण में आते हैं।

तुरत षडानन आप पठायउ।
लवनिमेष महँ मारि गिरायउ॥ ॥ ११ ॥

भावार्थ: शिव के पुत्र कार्तिकेय द्वारा तारकासुर के वध का संकेत है।

आप जलंधर असुर संहारा।
सुयश तुम्हार विदित संसारा॥ ॥ १२ ॥

भावार्थ: शिव के द्वारा जलंधर असुर की पराजय का स्मरण है।

त्रिपुरासुर सन युद्ध मचाई।
सबहिं कृपा कर लीन बचाई॥ ॥ १३ ॥

भावार्थ: त्रिपुरासुर के संहार और शिव की रक्षक करुणा का वर्णन है।

किया तपहिं भागीरथ भारी।
पुरब प्रतिज्ञा तासु पुरारी॥ ॥ १४ ॥

भावार्थ: भगीरथ के तप और गंगा के अवतरण में शिव की भूमिका याद की गई है।

दानिन महँ तुम सम कोउ नाहीं।
सेवक स्तुति करत सदाहीं॥ ॥ १५ ॥

भावार्थ: भक्त शिव को अनुपम दानी मानकर स्तुति करते हैं।

वेद नाम महिमा तव गाई।
अकथ अनादि भेद नहिं पाई॥ ॥ १६ ॥

भावार्थ: वेद भी शिव के अनादि और अगम्य स्वरूप को पूर्ण नहीं बता पाते।

प्रकटी उदधि मंथन में ज्वाला।
जरत सुरासुर भए विहाला॥ ॥ १७ ॥

भावार्थ: समुद्रमंथन में उत्पन्न विष से देव-असुर व्याकुल हुए।

कीन्ही दया तहँ करी सहाई।
नीलकण्ठ तब नाम कहाई॥ ॥ १८ ॥

भावार्थ: शिव ने विष धारण किया, इसलिए नीलकंठ कहलाए।

पूजन रामचन्द्र जब कीन्हा।
जीत के लंक विभीषण दीन्हा॥ ॥ १९ ॥

भावार्थ: श्रीराम के द्वारा शिव की पूजा और लंका विजय की कथा का संकेत है।

सहस कमल में हो रहे धारी।
कीन्ह परीक्षा तबहिं पुरारी॥ ॥ २० ॥

भावार्थ: सहस्र कमलों से शिवपूजा के समय भक्त की परीक्षा ली गई।

एक कमल प्रभु राखेउ जोई।
कमल नयन पूजन चहं सोई॥ ॥ २१ ॥

भावार्थ: एक कमल कम पड़ने पर श्रीराम की अडिग भक्ति का वर्णन है।

कठिन भक्ति देखी प्रभु शंकर।
भए प्रसन्न दिए इच्छित वर॥ ॥ २२ ॥

भावार्थ: शिव उस निष्ठा से प्रसन्न होकर वरदान देते हैं।

जय जय जय अनन्त अविनाशी।
करत कृपा सब के घटवासी॥ ॥ २३ ॥

भावार्थ: अनंत और अविनाशी शिव की जय तथा कृपा का स्मरण है।

दुष्ट सकल नित मोहि सतावै।
भ्रमत रहौं मोहि चैन न आवै॥ ॥ २४ ॥

भावार्थ: भक्त व्याकुल होकर अपनी पीड़ा व्यक्त करता है।

त्राहि त्राहि मैं नाथ पुकारो।
येहि अवसर मोहि आन उबारो॥ ॥ २५ ॥

भावार्थ: वह शिव से इस कठिन समय में रक्षा की विनती करता है।

लै त्रिशूल शत्रुन को मारो।
संकट से मोहि आन उबारो॥ ॥ २६ ॥

भावार्थ: त्रिशूलधारी महादेव से संकट दूर करने की प्रार्थना है।

मात-पिता भ्राता सब होई।
संकट में पूछत नहिं कोई॥ ॥ २७ ॥

भावार्थ: कठिन समय में सांसारिक सहारे अपर्याप्त लगते हैं।

स्वामी एक है आस तुम्हारी।
आय हरहु मम संकट भारी॥ ॥ २८ ॥

भावार्थ: भक्त शिव को अपना परम आश्रय मानता है।

धन निर्धन को देत सदा हीं।
जो कोई जांचे सो फल पाहीं॥ ॥ २९ ॥

भावार्थ: समृद्ध और निर्धन सबके प्रति समान कृपा की भावना है।

अस्तुति केहि विधि करैं तुम्हारी।
क्षमहु नाथ अब चूक हमारी॥ ॥ ३० ॥

भावार्थ: भक्त अपनी अपूर्ण स्तुति और भूलों के लिए क्षमा मांगता है।

शंकर हो संकट के नाशन।
मंगल कारण विघ्न विनाशन॥ ॥ ३१ ॥

भावार्थ: शिव विघ्नों के नाशक और कल्याण के कारण माने जाते हैं।

योगी यति मुनि ध्यान लगावैं।
शारद नारद शीश नवावैं॥ ॥ ३२ ॥

भावार्थ: योगी, मुनि और देवर्षि शिव का ध्यान करते हैं।

नमो नमो जय नमः शिवाय।
सुर ब्रह्मादिक पार न पाय॥ ॥ ३३ ॥

भावार्थ: शिव की महिमा देवताओं की कल्पना से भी परे है।

जो यह पाठ करे मन लाई।
ता पर होत है शम्भु सहाई॥ ॥ ३४ ॥

भावार्थ: श्रद्धा से पाठ करने वाले को शिव की कृपा की आशा है।

ऋनियां जो कोई हो अधिकारी।
पाठ करे सो पावन हारी॥ ॥ ३५ ॥

भावार्थ: चालीसा की परंपरागत फलश्रुति का संकेत है।

पुत्र हीन कर इच्छा जोई।
निश्चय शिव प्रसाद तेहि होई॥ ॥ ३६ ॥

भावार्थ: संतान की इच्छा वाले भक्त की कामना और विश्वास व्यक्त है।

पण्डित त्रयोदशी को लावे।
ध्यान पूर्वक होम करावे॥ ॥ ३७ ॥

भावार्थ: त्रयोदशी पर पूजा और हवन का पारंपरिक उल्लेख है।

त्रयोदशी व्रत करै हमेशा।
ताके तन नहीं रहै कलेशा॥ ॥ ३८ ॥

भावार्थ: त्रयोदशी व्रत के पारंपरिक महत्त्व का वर्णन है।

धूप दीप नैवेद्य चढ़ावे।
शंकर सम्मुख पाठ सुनावे॥ ॥ ३९ ॥

भावार्थ: धूप, दीप और नैवेद्य से शिवपूजन की रीति बताई गई है।

जन्म जन्म के पाप नसावे।
अन्त धाम शिवपुर में पावे॥ ॥ ४० ॥

भावार्थ: फलश्रुति में पापों के नाश और शिवधाम की प्राप्ति का विश्वास है।

कहैं अयोध्यादास आस तुम्हारी।
जानि सकल दुःख हरहु हमारी॥ ॥ ४१ ॥

भावार्थ: अयोध्यादास अपनी समस्त पीड़ा शिवचरणों में रखकर कृपा मांगते हैं।

समापन दोहे

नित नेम कर प्रातः ही, पाठ करौ चालीसा।
तुम मेरी मनोकामना, पूर्ण करो जगदीश॥

भावार्थ: नियमपूर्वक पाठ करने और भगवान से मंगल की प्रार्थना करने का भाव है।

मगसर छठि हेमन्त ऋतु, संवत चौसठ जान।
अस्तुति चालीसा शिवहि, पूर्ण कीन कल्याण॥

भावार्थ: यह दोहा रचना के पारंपरिक काल-उल्लेख का परिचय देता है; निश्चित ऐतिहासिक वर्ष स्थापित नहीं है।

पाठ-संदर्भ: पुरानी मुद्रित पुस्तिका पर आधारित पाठ और प्रकाशन-पाठांतर का विवेचन। मूल पद्य परंपरागत हैं; भावार्थ NityaJaap द्वारा स्वतंत्र रूप से लिखे गए हैं।

शिव चालीसा से जुड़े प्रश्न

शिव चालीसा में कितनी चौपाइयाँ हैं?

प्रचलित पाठ में ४० मुख्य चौपाइयों के अतिरिक्त कवि अयोध्यादास की समापन-पंक्ति भी आती है; इसलिए कुछ संस्करण ४१ गिनते हैं।

शिव चालीसा कब पढ़ सकते हैं?

श्रद्धालु इसे सोमवार, श्रावण, महाशिवरात्रि या किसी भी दिन पढ़ते हैं।