लक्ष्मी चालीसा क्या है?
यह देवी लक्ष्मी की स्तुति का पारंपरिक अवधी-हिंदी भक्ति-पाठ है। इसमें देवी को सागर-कन्या, विष्णुप्रिया तथा सीता-स्वरूप मानकर ज्ञान, करुणा और मंगल की प्रार्थना की गई है। समापन पद में रामदास नाम आता है, जिसे पारंपरिक रचनाकार-संकेत माना जाता है।
यहाँ ४० मुख्य चौपाइयों वाला प्रचलित संस्करण है; अलग प्रकाशनों में दोहों, शब्दों और पद-गणना में अंतर हो सकता है। फलश्रुति के परिणाम भक्ति-परंपरा की मान्यताएँ हैं, निश्चित आरोग्य या धनलाभ का वादा नहीं। संपूर्ण पाठ देखें या दिवाली लक्ष्मी पूजा विधि पढ़ें।
श्री लक्ष्मी चालीसा — संपूर्ण पाठ
आरंभिक दोहा और सोरठा
मातु लक्ष्मी करि कृपा, करो हृदय में वास।
मनोकामना सिद्ध करि, पुरवहु मेरी आस॥
यही मोर अरदास, हाथ जोड़ विनती करूँ।
सब विधि करौ सुवास, जय जननि जगदम्बिका॥
भावार्थ: हे माता लक्ष्मी, मेरे हृदय में सद्भाव जगाइए और मेरी शुभ कामनाओं में मार्गदर्शन दीजिए।
सिन्धु सुता मैं सुमिरौं तोही।
ज्ञान बुद्धि विद्या दे मोही॥ १ ॥
सरल हिंदी भावार्थ: समुद्र-पुत्री महालक्ष्मी से ज्ञान, बुद्धि और विद्या की याचना।
तुम समान नहीं कोई उपकारी।
सब विधि पुरवहु आस हमारी॥ २ ॥
सरल हिंदी भावार्थ: भक्त माता को अद्वितीय उपकार करने वाली मानकर अपनी प्रार्थना व्यक्त करता है।
जय जय जय जननी जगदम्बा।
सबकी तुम ही हो अवलम्बा॥ ३ ॥
सरल हिंदी भावार्थ: जगत की जननी को सभी प्राणियों का आधार मानकर जय बोली जाती है।
तुम ही हो घट-घट की वासी।
विनती यही हमारी खासी॥ ४ ॥
सरल हिंदी भावार्थ: हर हृदय में देवी की उपस्थिति को स्वीकार कर विनती की जाती है।
जग जननी जय सिन्धुकुमारी।
दीनन की तुम हो हितकारी॥ ५ ॥
सरल हिंदी भावार्थ: दीन-दुखियों का हित करने वाली समुद्र-कन्या का वंदन है।
विनवौं नित्य तुमहिं महारानी।
कृपा करो जग जननि भवानी॥ ६ ॥
सरल हिंदी भावार्थ: प्रतिदिन माता से करुणा की याचना की गई है।
केहि विधि स्तुति करौं तिहारी।
सुधि लीजै अपराध बिसारी॥ ७ ॥
सरल हिंदी भावार्थ: भक्त अपनी सीमित स्तुति और त्रुटियों के लिए क्षमा चाहता है।
कृपा दृष्टि चितवो मम ओरी।
जग जननी विनती सुन मोरी॥ ८ ॥
सरल हिंदी भावार्थ: जगज्जननी से दयादृष्टि और प्रार्थना सुनने का निवेदन है।
ज्ञान बुद्धि सब सुख की दाता।
संकट हरो हमारी माता॥ ९ ॥
सरल हिंदी भावार्थ: ज्ञान, विवेक और सुख के साथ विपत्तियों में सहारा माँगा गया है।
क्षीर सिन्धु जब विष्णु मथायो।
चौदह रत्न सिन्धु में पायो॥ १० ॥
सरल हिंदी भावार्थ: समुद्र-मंथन की पौराणिक कथा और उसमें निकले चौदह रत्नों का स्मरण।
चौदह रत्न में तुम सुखरासी।
सेवा कियो प्रभु बनि दासी॥ ११ ॥
सरल हिंदी भावार्थ: देवी को समुद्र-मंथन के कल्याणकारी रत्नों में एक और विष्णुप्रिया कहा गया है।
जब-जब जन्म प्रभु जहाँ लीन्हा।
रूप बदल तहँ सेवा कीन्हा॥ १२ ॥
सरल हिंदी भावार्थ: पौराणिक विश्वास के अनुसार विभिन्न अवतारों में विष्णु के साथ देवी की उपस्थिति है।
स्वयं विष्णु जब नर तनु धारा।
लीन्हेउ अवधपुरी अवतारा॥ १३ ॥
सरल हिंदी भावार्थ: भगवान विष्णु के श्रीराम रूप में अयोध्या-अवतार का संकेत है।
तब तुम प्रगट जनकपुर माहीं।
सेवा कियो हृदय पुलकाहीं॥ १४ ॥
सरल हिंदी भावार्थ: देवी के सीता स्वरूप में जनकपुर में प्रकट होने की स्तुति है।
अपनायो तोहि अन्तर्यामी।
विश्व विदित त्रिभुवन के स्वामी॥ १५ ॥
सरल हिंदी भावार्थ: देवी और अंतर्यामी विष्णु के पारस्परिक संबंध की कथा कही गई है।
तुम सम प्रबल शक्ति नहिं आनी।
कहँ लौं महिमा कहौं बखानी॥ १६ ॥
सरल हिंदी भावार्थ: भक्त देवी की अपार शक्ति और महिमा का वर्णन कर पाने में असमर्थता व्यक्त करता है।
मन क्रम वचन करै सेवकाई।
मन इच्छित वांछित फल पाई॥ १७ ॥
सरल हिंदी भावार्थ: मन, कर्म और वाणी से सेवा को समर्पित भक्त के इच्छित मंगल का वर्णन है।
तजि छल कपट और चतुराई।
पूजहिं विविध भाँति मन लाई॥ १८ ॥
सरल हिंदी भावार्थ: बिना छल-कपट के मन लगाकर आराधना करने का संदेश है।
और हाल मैं कहौं बुझाई।
जो यह पाठ करै मन लाई॥ १९ ॥
सरल हिंदी भावार्थ: एकाग्र चित्त से चालीसा पढ़ने के पारंपरिक महत्त्व की बात है।
ताको कोई कष्ट न होई।
मन इच्छित पावै फल सोई॥ २० ॥
सरल हिंदी भावार्थ: फलश्रुति में भक्तिपूर्वक पाठ से कष्ट कम होने की आशा कही गई है, यह निश्चित परिणाम की गारंटी नहीं।
त्राहि त्राहि जय दुःख निवारिणी।
त्रिविध ताप भव बंधन हारिणी॥ २१ ॥
सरल हिंदी भावार्थ: दुःख और संसार-बंधन से उबरने के लिए देवी से पुकार है।
जो यह चालीसा पढ़े पढ़ावे।
ध्यान लगाकर सुने सुनावे॥ २२ ॥
सरल हिंदी भावार्थ: ध्यान से पढ़ने, सुनने और दूसरों को सुनाने की परंपरा का उल्लेख।
ताको कोई न रोग सतावै।
पुत्र आदि धन सम्पत्ति पावै॥ २३ ॥
सरल हिंदी भावार्थ: फलश्रुति में आरोग्य एवं परिवार-समृद्धि की पारंपरिक कामना व्यक्त है, चिकित्सकीय वादा नहीं।
पुत्रहीन अरु सम्पत्तिहीना।
अन्ध बधिर कोढ़ी अति दीना॥ २४ ॥
सरल हिंदी भावार्थ: अभाव या शारीरिक कठिनाई वाले भक्तों का भी स्मरण करके सहारा माँगा गया है।
विप्र बोलाय कै पाठ करावै।
शंका दिल में कभी न लावै॥ २५ ॥
सरल हिंदी भावार्थ: पुरोहित की सहायता से पाठ कराने की पारंपरिक व्यवस्था का उल्लेख।
पाठ करावै दिन चालीसा।
ता पर कृपा करैं गौरीसा॥ २६ ॥
सरल हिंदी भावार्थ: चालीस दिनों के पाठ से कृपा प्राप्ति की लोक-भक्ति मान्यता कही गई है।
सुख सम्पत्ति बहुत सो पावै।
कमी नहीं काहू की आवै॥ २७ ॥
सरल हिंदी भावार्थ: संतोष और समृद्धि की प्रार्थना को भक्त-आस्था के रूप में प्रस्तुत किया गया है।
बारह मास करै जो पूजा।
तेहि सम धन्य और नहिं दूजा॥ २८ ॥
सरल हिंदी भावार्थ: पूरे वर्ष नियमपूर्वक पूजन की प्रतिबद्धता का वर्णन है।
प्रतिदिन पाठ करै मन माहीं।
उन सम कोई जग में नाहीं॥ २९ ॥
सरल हिंदी भावार्थ: दैनिक स्मरण को भक्तिमार्ग में विशेष महत्त्व दिया गया है।
बहु विधि क्या मैं करौं बड़ाई।
लेय परीक्षा ध्यान लगाई॥ ३० ॥
सरल हिंदी भावार्थ: माता की महिमा के सामने भक्त अपनी अभिव्यक्ति को अपर्याप्त मानता है।
करि विश्वास करैं व्रत नेमा।
होय सिद्ध उपजै उर प्रेमा॥ ३१ ॥
सरल हिंदी भावार्थ: नियम, विश्वास और हृदय में प्रेम के जागरण का संदेश है।
जय जय जय लक्ष्मी भवानी।
सब में व्यापित हो गुण खानी॥ ३२ ॥
सरल हिंदी भावार्थ: सर्वव्याप्त गुणमयी लक्ष्मी देवी का गुणगान है।
तुम्हरो तेज प्रबल जग माहीं।
तुम सम कोउ दयालु कहूँ नाहीं॥ ३३ ॥
सरल हिंदी भावार्थ: माता की तेजस्विता तथा दयालुता की स्तुति है।
मोहि अनाथ की सुधि अब लीजै।
संकट काटि भक्ति मोहि दीजै॥ ३४ ॥
सरल हिंदी भावार्थ: भक्त स्वयं को असहाय मानकर देवी से भक्ति और संकट में सहारा माँगता है।
भूल चूक करि क्षमा हमारी।
दर्शन दीजै दशा निहारी॥ ३५ ॥
सरल हिंदी भावार्थ: गलतियों के लिए क्षमा और कृपादर्शन की विनती है।
बिन दर्शन व्याकुल अधिकारी।
तुमहिं अछत दुःख सहते भारी॥ ३६ ॥
सरल हिंदी भावार्थ: देवी से दूरी अनुभव कर रहे मन की व्याकुलता व्यक्त है।
नहिं मोहिं ज्ञान बुद्धि है मन में।
सब जानत हो अपने मन में॥ ३७ ॥
सरल हिंदी भावार्थ: भक्त अपनी बुद्धि की सीमाएँ स्वीकार कर सर्वज्ञ माता को प्रणाम करता है।
रूप चतुर्भुज करके धारण।
कष्ट मोर अब करहु निवारण॥ ३८ ॥
सरल हिंदी भावार्थ: चार भुजाओं वाले लक्ष्मी स्वरूप से संरक्षण की प्रार्थना है।
केहि प्रकार मैं करौं बड़ाई।
ज्ञान बुद्धि मोहिं नहिं अधिकाई॥ ३९ ॥
सरल हिंदी भावार्थ: देवी के पूर्ण गुणगान में अपनी असमर्थता को विनम्रता से स्वीकारा गया है।
रामदास अब कहै पुकारी।
करो दूर तुम विपति हमारी॥ ४० ॥
सरल हिंदी भावार्थ: समापन में पारंपरिक रचनाकार रामदास देवी से विपदाओं के निराकरण की प्रार्थना करते हैं।
समापन दोहे
त्राहि त्राहि दुःख हारिणी, हरो बेगि सब त्रास।
जयति जयति जय लक्ष्मी, करो शत्रुन का नाश॥
रामदास धरि ध्यान नित, विनय करत कर जोर।
मातु लक्ष्मी दास पर, करहु दया की कोर॥
भावार्थ: दीन भक्त देवी से भय, विपत्ति और विरोध से रक्षा तथा करुणा की प्रार्थना करता है।
पाठ-समीक्षा: प्रचलित पारंपरिक चालीसा का स्वतंत्र पुनर्लेखन एवं समन्वित पाठ; शब्दांतरों की तुलना स्रोत-उल्लेख वाले परंपरागत मुद्रित संस्करण तथा उपलब्ध गायन-पाठ से की गई। इस संस्करण में ४०वीं चौपाई “रामदास अब कहै पुकारी” रखी गई है; अन्य संस्करणों में इसे दोहा या अलग रूप में गिना जा सकता है।
मूल भक्तिपाठ और स्वतंत्र आधुनिक हिंदी भावार्थ के बीच अंतर स्पष्ट रखा गया है। आधुनिक गीत के बोल, रिकॉर्डिंग और किसी अन्य प्रकाशक की व्याख्या की पुनर्प्रति नहीं की गई।
सामान्य प्रश्न
श्री लक्ष्मी चालीसा में कितनी चौपाइयाँ हैं?
इस प्रचलित संस्करण में ४० मुख्य चौपाइयाँ और आरंभिक तथा अंतिम दोहे हैं। कुछ प्रकाशनों में पद-गणना और पाठांतर अलग मिलते हैं।
इसे कब पढ़ सकते हैं?
भक्त इसे शुक्रवार, दीपावली, धनतेरस या दैनिक प्रार्थना के समय श्रद्धा से पढ़ते हैं।
क्या चालीसा आर्थिक लाभ का निश्चित उपाय है?
नहीं। फलश्रुति भक्ति की पारंपरिक मान्यताओं का वर्णन है; कोई आर्थिक, चिकित्सकीय या कानूनी गारंटी नहीं।