श्रीसर्वोत्तम स्तोत्र - पूर्ण पाठ

पुष्टिमार्ग परंपरा में श्रीवल्लभाचार्य की महिमा से संबंधित श्रीसर्वोत्तम स्तोत्र हिंदी में पढ़ें। उपलब्ध पाठ का संपादकीय सत्यापन जारी है।

श्रीसर्वोत्तम स्तोत्र के बारे में

About Sarvottam Stotram

श्रीसर्वोत्तम स्तोत्र भगवान कृष्ण की स्तुति का एक अत्यंत पवित्र और शक्तिशाली ग्रंथ है। यह स्तोत्र 108 नामों से युक्त है और भगवान कृष्ण के सभी गुणों, महिमा और भक्ति का वर्णन करता है। इस स्तोत्र का नियमित पाठ करने से व्यक्ति को मानसिक शांति, आध्यात्मिक विकास और भक्ति और प्रार्थना होती है।

श्रीसर्वोत्तम स्तोत्र के लाभ

Benefits of Sarvottam Stotram

  • भक्ति और प्रार्थना
  • आध्यात्मिक शांति और मानसिक शक्ति में वृद्धि
  • भगवान कृष्ण के प्रति भक्ति भावना का विकास
  • कर्म के बंधन से मुक्ति और मोक्ष की प्राप्ति
  • संकटों से रक्षा और सफलता प्राप्ति

श्रीसर्वोत्तम स्तोत्र - पूर्ण पाठ

Sarvottam Stotram - Complete Text

प्राकृतधर्मानाश्रयम् अप्राकृत – निखिल – धर्मरूपमिति ||

निगमप्रतिपाद्यं यत् तच्छुध्दं साकृति स्तौमि || 1 ||

कलिकाल – तमश्छन्न – दृष्टित्वाद् विदुषामपि ||

सम्प्रत्यविषयस्तस्य माहात्म्यं समभूद् भुवि || 2 ||

दयया निजमाहात्म्यं करिष्यन् प्रकटं हरिः ||

वाण्या यदा तदा स्वास्यं प्रादुर्भूतं चकार हि || 3 ||

तदुक्तमपि दुर्बोधं सुबोधं स्याद् यथा तथा ||

तन्नामाष्टोत्तरशतं प्रवक्ष्याम्यखिलाघहृत् || 4 ||

ऋषिरग्निकुमारस्तु नाम्नां छन्दो जगत्यसौ ||

श्रीकृष्णास्यं देवता च बीजं कारूणिक: प्रभु: || 5 ||

विनियोगो भक्तियोग-प्रतिबन्ध-विनाशने ||

कृष्णाधरामृतास्वाद – सिद्धिरत्र न संशयः || 6 ||

आनन्द: परमानन्द: श्रीकृष्णास्यं कृपानिधि: ||

दैवोध्दारप्रयत्नात्मा स्मृतिमात्रार्तिनाशन: || 7 ||

श्रीभागवत – गूढार्थ – प्रकाशन-परायण: ||

साकार – ब्रह्म – वादैक – स्थापको वेदपारग: || 8 ||

मायावाद-निराकर्ता सर्ववादि – निरासकृत् ||

भक्तिमार्गाब्जमार्तण्ड: स्त्रीशूद्राद्युद्धृतिक्षम: || 9 ||

अङ्गीकृत्यैव गोपीश – वल्लभी – कृत – मानव: ||

अङ्गीकृतौ समर्यादो महाकारुणिको विभु: || 10 ||

अदेय – दान – दक्षश्च महोदार – चरित्रवान् ||

प्राकृतानुकृतिव्याज – मोहितासुरमानुष: || 11 ||

वैश्र्वानरो वल्लभाख्य: सद्रूपो हितकृत् – सताम् ||

जनशिक्षाकृते कृष्णभक्तिकृन्निखिलेष्टद: || 12 ||

सर्व – लक्षण – सम्पन्नः श्रीकृष्ण – ज्ञानदो गुरुः ||

स्वानन्दतुन्दिल: पद्म-दलायत-विलोचन: || 13 ||

कृपादृग् – वृष्टि – संहृष्ट – दास – दासी – प्रिय: पति: ||

रोषदृक्पातसम्प्लुष्ट – भक्तद्विट् भक्तसेवित: || 14 ||

सुखसेव्यो दुराराध्यो दुर्लभाङ्घ्रिसरोरुह: ||

उग्रप्रतापो वाक्सीधु – पूरिताशेष – सेवकः || 15 ||

श्रीभागवत – पीयूष – समुद्र – मथन – क्षम: ||

तत्सार – भूत – रासस्त्री – भावपूरित – विग्रह: || 16 ||

सान्निध्य – मात्र – दत्त – श्रीकृष्णप्रेमा विमुक्तिद: ||

रासलीलैक – तात्पर्य: कृपयैतत्कथा – प्रद: || 17 ||

विरहानुभवैकार्थ – सर्व – त्यागोपदेशक: ||

भक्त्याचारोपदेष्टा च कर्म – मार्ग – प्रवर्तक: || 18 ||

यागादौ भक्तिमार्गैक – साधनत्वोपदेशक: ||

पूर्णानन्द: पूर्णकामो वाक्पतिर्विबुधेश्र्वर: || 19 ||

कृष्ण – नाम – सहस्त्रस्य वक्ता भक्तपरायण: ||

भक्त्याचारोपदेशार्थ – नानावाक्यनिरूपक: || 20 ||

स्वार्थोज्झिताखिल – प्राण – प्रियस्तादृश – वेष्टित: ||

स्वदासार्थ – कृताशेष – साधन: सर्वशक्तिधृक् || 21 ||

भुवि भक्ति – प्रचारैक – कृते स्वान्वयकृत् पिता ||

स्ववंशे स्थापिताशेषस्वमाहात्म्य: स्मयापह: || 22 ||

पति – व्रता – पति: पार – लौकिकैहिक – दानकृत् ||

निगूढ – हृदयोऽनन्य – भक्तेषु ज्ञापिताशय: || 23 ||

उपासनादि – मार्गाति – मुग्ध – मोह – निवारक: ||

भक्तिमार्गे सर्वमार्ग – वैलक्षण्यानुभूतिकृत् || 24 ||

पृथक् – शरण – मार्गोपदेष्टा श्रीकृष्ण – हार्दवित् ||

प्रतिक्षण – निकुञ्जस्थ – लीलारस – सुपूरित: || 25 ||

तत्कथाक्षिप्त – चित्तस्तद्विस्मृतान्यो व्रजप्रिय: ||

प्रियव्रजस्थिति: पुष्टिलीला – कर्ता रह:प्रिय: || 26 ||

भक्तेच्छा – पूरक: सर्वाज्ञातलीलोऽति – मोहन: ||

सर्वासक्तो भक्तमात्रासक्त: पतित – पावन: || 27 ||

स्वयशो – गान – संहृष्ट – हृदयाम्भोज – विष्टर: ||

यश: – पीयूषलहरी – प्लावितान्य – रस: पर: || 28 ||

लीलामृत – रसार्द्रार्द्री – कृताखिल – शरीर – भृत् ||

गोवर्धनस्थित्युत्साहस्तल्लीला – प्रेम – पूरित: || 29 ||

यज्ञ – भोक्ता यज्ञ – कर्ता चतुर्वर्ग – विशारद: ||

सत्य – प्रतिज्ञस् त्रिगुणातीतो नयविशारद: || 30 ||

स्व – कीर्तिवर्धनस्तत्त्वसूत्र – भाष्य – प्रदर्शक: ||

मायावादाख्य – तूलाग्निर् ब्रह्मवादनिरूपक: || 31 ||

अप्राकृताखिलाकल्प – भूषित: सहज – स्मित: ||

त्रिलोकी – भूषणं भूमि – भाग्यं सहज – सुन्दर: || 32 ||

अशेष – भक्त – सम्प्रार्थ्य – चरणाब्ज – रजो – धन: ||

इत्यानन्दनिधे: प्रोक्तं नाम्नामष्टोत्तरं शतम् || 33 ||

श्रद्धा – विशुद्ध – बुद्धिर्य: पठत्यनुदिनं जन: ||

स तदेकमना: सिद्धिम् उक्तां प्राप्नोत्यसंशय: || 34 ||

तदप्राप्तौ वृथा मोक्ष: तदाप्तौ तद्गतार्थता ||

अत: सर्वोत्तमं स्तोत्रं जप्यं कृष्णरसार्थिभि: || 35 ||

|| इति श्रीमदग्निकुमारप्रोक्तं श्रीसर्वोत्तमस्तोत्रं सम्पूर्णम् ||