श्री दुर्गा चालीसा: संपूर्ण ४० चौपाइयाँ व हिंदी भावार्थ

श्री दुर्गा चालीसा का संपूर्ण ४० चौपाइयों वाला पाठ और सरल हिंदी भावार्थ पढ़ें। नवरात्रि पाठ, माता दुर्गा की स्तुति और वीडियो।

दुर्गा चालीसा के बारे में

दुर्गा चालीसा माता दुर्गा की शक्ति, करुणा और विभिन्न स्वरूपों का भक्ति-गीत है। इसमें शुम्भ-निशुम्भ, रक्तबीज और महिषासुर के संहार का स्मरण मिलता है। यहाँ प्रचलित ४० चौपाइयों और अंतिम प्रार्थना का पाठ दिया गया है।

संपूर्ण पाठ पढ़ें या महिषासुर मर्दिनी स्तोत्र देखें।

श्री दुर्गा चालीसा — ४० चौपाइयाँ

नमो नमो दुर्गे सुख करनी।
नमो नमो दुर्गे दुःख हरनी। ॥ १ ॥

भावार्थ: माता दुर्गा को प्रणाम; भक्त उन्हें सुख देने और दुःख दूर करने वाली मानते हैं।

निरंकार है ज्योति तुम्हारी।
तिहूँ लोक फैली उजियारी। ॥ २ ॥

भावार्थ: माता की ज्योति निराकार और तीनों लोकों में व्याप्त बताई गई है।

शशि ललाट मुख महाविशाला।
नेत्र लाल भृकुटि विकराला। ॥ ३ ॥

भावार्थ: उनके मुख पर चंद्रमा-सी आभा और रक्षक के रूप में तेजस्वी नेत्रों का वर्णन है।

रूप मातु को अधिक सुहावे।
दरश करत जन अति सुख पावे। ॥ ४ ॥

भावार्थ: माता का रूप भक्तों के हृदय में आनंद और श्रद्धा जगाता है।

तुम संसार शक्ति लै कीना।
पालन हेतु अन्न धन दीना। ॥ ५ ॥

भावार्थ: विश्व की शक्ति और जीवन के पालन के लिए अन्न-धन का मूल देवी को माना गया है।

अन्नपूर्णा हुई जग पाला।
तुम ही आदि सुन्दरी बाला। ॥ ६ ॥

भावार्थ: अन्नपूर्णा और आदि सुंदरी के रूप में देवी समस्त जगत का पोषण करती हैं।

प्रलयकाल सब नाशन हारी।
तुम गौरी शिवशंकर प्यारी। ॥ ७ ॥

भावार्थ: देवी विनाश और सृजन की शक्ति हैं तथा शिव की प्रिय गौरी हैं।

शिव योगी तुम्हरे गुण गावें।
ब्रह्मा विष्णु तुम्हें नित ध्यावें। ॥ ८ ॥

भावार्थ: शिव और अन्य देवता देवी के गुणों की निरंतर स्तुति करते हैं।

रूप सरस्वती को तुम धारा।
दे सुबुद्धि ऋषि मुनिन उबारा। ॥ ९ ॥

भावार्थ: सरस्वती के रूप में देवी ज्ञान और विवेक की प्रेरणा देती हैं।

धरयो रूप नरसिंह को अम्बा।
परगट भई फाड़कर खम्बा। ॥ १० ॥

भावार्थ: नरसिंह की कथा के माध्यम से धर्म की रक्षा करने वाली दिव्य शक्ति को स्मरण किया गया है।

रक्षा करि प्रह्लाद बचायो।
हिरण्याक्ष को स्वर्ग पठायो। ॥ ११ ॥

भावार्थ: प्रह्लाद की रक्षा और अधर्म के अंत का भक्तिमय वर्णन है।

लक्ष्मी रूप धरो जग माहीं।
श्री नारायण अंग समाहीं। ॥ १२ ॥

भावार्थ: लक्ष्मी के रूप में देवी समृद्धि और नारायण के साथ दिव्य एकता की प्रतीक हैं।

क्षीरसिन्धु में करत विलासा।
दयासिन्धु दीजै मन आसा। ॥ १३ ॥

भावार्थ: क्षीरसागर की छवि के साथ भक्त देवी से करुणा और मनोकामना की प्रार्थना करता है।

हिंगलाज में तुम्हीं भवानी।
महिमा अमित न जात बखानी। ॥ १४ ॥

भावार्थ: हिंगलाज में पूजित भवानी की अनंत महिमा का गुणगान है।

मातंगी अरु धूमावति माता।
भुवनेश्वरी बगला सुख दाता। ॥ १५ ॥

भावार्थ: मातंगी, धूमावती, भुवनेश्वरी और बगलामुखी जैसे रूपों में एक ही शक्ति की वंदना है।

श्री भैरव तारा जग तारिणी।
छिन्न भाल भव दुःख निवारिणी। ॥ १६ ॥

भावार्थ: तारा और अन्य देवी रूपों को संसार के दुःखों से उबारने वाली शक्ति माना गया है।

केहरि वाहन सोह भवानी।
लांगुर वीर चलत अगवानी। ॥ १७ ॥

भावार्थ: सिंहवाहिनी भवानी का वीर रूप और उनके अग्रगामी गणों का चित्रण है।

कर में खप्पर खड्ग विराजै।
जाको देख काल डर भाजै। ॥ १८ ॥

भावार्थ: खड्ग और खप्पर धारण करने वाली देवी अधर्म के लिए भय उत्पन्न करती हैं।

सोहै अस्त्र और त्रिशूला।
जाते उठत शत्रु हिय शूला। ॥ १९ ॥

भावार्थ: उनके आयुध और त्रिशूल दुष्ट प्रवृत्तियों के प्रतिरोध के प्रतीक हैं।

नगरकोट में तुम्हीं विराजत।
तिहुँलोक में डंका बाजत। ॥ २० ॥

भावार्थ: नगरकोट की भवानी की प्रतिष्ठा तीनों लोकों में प्रसिद्ध बताई गई है।

शुम्भ निशुम्भ दानव तुम मारे।
रक्तबीज शंखन संहारे। ॥ २१ ॥

भावार्थ: शुम्भ, निशुम्भ और रक्तबीज के विनाश द्वारा धर्म की विजय स्मरण की गई है।

महिषासुर नृप अति अभिमानी।
जेहि अघ भार मही अकुलानी। ॥ २२ ॥

भावार्थ: महिषासुर के अहंकार और उसके कारण पृथ्वी पर बढ़े संकट का वर्णन है।

रूप कराल कालिका धारा।
सेन सहित तुम तिहि संहारा। ॥ २३ ॥

भावार्थ: देवी के कालिका रूप द्वारा महिषासुर की सेना समेत पराजय का वर्णन है।

परी गाढ़ सन्तन पर जब जब।
भई सहाय मातु तुम तब तब। ॥ २४ ॥

भावार्थ: जब भक्त संकट में पड़ते हैं, वे माता को अपना सहारा मानते हैं।

अमरपुरी अरु बासव लोका।
तब महिमा सब रहें अशोका। ॥ २५ ॥

भावार्थ: देवलोक तक में देवी की महिमा से शोक दूर होने की भावना प्रकट है।

ज्वाला में है ज्योति तुम्हारी।
तुम्हें सदा पूजें नर-नारी। ॥ २६ ॥

भावार्थ: ज्वाला देवी की ज्योति में दिव्य उपस्थिति का स्मरण किया गया है।

प्रेम भक्ति से जो यश गावें।
दुःख दारिद्र निकट नहिं आवें। ॥ २७ ॥

भावार्थ: भक्ति-परंपरा में देवी का यश गाना आशा और आंतरिक संतोष का साधन माना गया है।

ध्यावे तुम्हें जो नर मन लाई।
जन्म-मरण ताकौ छुटि जाई। ॥ २८ ॥

भावार्थ: एकाग्र मन से देवी का स्मरण मोक्ष की आकांक्षा से जुड़ा है।

जोगी सुर मुनि कहत पुकारी।
योग न हो बिन शक्ति तुम्हारी। ॥ २९ ॥

भावार्थ: योगियों और ऋषियों के लिए भी शक्ति की अनिवार्यता को रेखांकित किया गया है।

शंकर आचारज तप कीनो।
काम अरु क्रोध जीति सब लीनो। ॥ ३० ॥

भावार्थ: शिव के तप और काम-क्रोध पर विजय की कथा का संकेत है।

निशिदिन ध्यान धरो शंकर को।
काहु काल नहिं सुमिरो तुमको। ॥ ३१ ॥

भावार्थ: यह पद शक्ति को न पहचान पाने की स्थिति का वर्णन करता है।

शक्ति रूप का मरम न पायो।
शक्ति गई तब मन पछितायो। ॥ ३२ ॥

भावार्थ: देवी से विमुख होने पर शक्ति के महत्त्व का बोध होने की कथा कही गई है।

शरणागत हुई कीर्ति बखानी।
जय जय जय जगदम्ब भवानी। ॥ ३३ ॥

भावार्थ: शरण में जाकर जगदम्बा की जय का घोष किया गया है।

भई प्रसन्न आदि जगदम्बा।
दई शक्ति नहिं कीन विलम्बा। ॥ ३४ ॥

भावार्थ: आदिशक्ति की कृपा से समर्थता मिलने की आशा व्यक्त होती है।

मोको मातु कष्ट अति घेरो।
तुम बिन कौन हरै दुःख मेरो। ॥ ३५ ॥

भावार्थ: भक्त अपने घिरे हुए कष्टों में माता से सहायता मांगता है।

आशा तृष्णा निपट सतावें।
मोह मदादिक सब बिनशावें। ॥ ३६ ॥

भावार्थ: आशा, तृष्णा, मोह और अहंकार से मुक्त होने की प्रार्थना है।

शत्रु नाश कीजै महारानी।
सुमिरौं इकचित तुम्हें भवानी। ॥ ३७ ॥

भावार्थ: भक्त एकाग्र होकर देवी से विपत्तियों और विरोध का सामना करने की शक्ति मांगता है।

करो कृपा हे मातु दयाला।
ऋद्धि-सिद्धि दै करहु निहाला। ॥ ३८ ॥

भावार्थ: माता से दया, उन्नति और सद्बुद्धि की प्रार्थना की गई है।

जब लगि जिऊँ दया फल पाऊँ।
तुम्हरो यश मैं सदा सुनाऊँ। ॥ ३९ ॥

भावार्थ: जीवनभर देवी का गुणगान करते रहने का संकल्प व्यक्त किया गया है।

श्री दुर्गा चालीसा जो कोई गावै।
सब सुख भोग परमपद पावै। ॥ ४० ॥

भावार्थ: चालीसा की फलश्रुति में भक्तिमय पाठ का पारंपरिक महत्त्व बताया गया है।

देवीदास शरण निज जानी।
करहु कृपा जगदम्ब भवानी॥

समापन-प्रार्थना: देवीदास स्वयं को माता की शरण में समर्पित कर कृपा की प्रार्थना करते हैं।

पाठ-संदर्भ: संस्कृत विकिस्रोत। विभिन्न प्रकाशनों में शब्द-भेद मिल सकते हैं। मूल पारंपरिक पद्य सार्वजनिक साहित्य हैं; इस पृष्ठ के हिंदी भावार्थ स्वतंत्र रूप से तैयार किए गए हैं। स्रोत-पाठ के योगदानकर्ताओं को श्रेय: CC BY-SA।

दुर्गा चालीसा से जुड़े प्रश्न

दुर्गा चालीसा में कितनी चौपाइयाँ हैं?

इस संस्करण में ४० मुख्य चौपाइयाँ और अंत में देवीदास की समापन-प्रार्थना है।

दुर्गा चालीसा कब पढ़ी जाती है?

भक्त इसे नवरात्रि, दुर्गा पूजा और दैनिक आराधना में श्रद्धा से पढ़ते हैं।